अनुरोध भारद्वाज
साहित्य से सरोकार का जिम्मा क्या अब बूढे बुजुर्ग ही उठाएंगे। यदि नहीं तो नौजवान पीढी का अध्ययन चटकारेदार मैग्जीन, खालिस गपशप और जासूसी उपन्यासों तक क्यों सिमट रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की आत्मकथा को पढने वाले नहीं मिल रहे। उनके सपनों का भारत ताले में कैद पडा है। न किसी में अटल बिहारी वाजपेई की संसदीय यात्रा को पढने की फुर्सत है और न गोलवलकर के विचार नवनीत को समझने की उत्सकुता। महर्षि दयानंद की सत्यार्थ प्रकाश को हाथ में थामने का समय भी किसी के पास नहीं है। कालजयी साहित्य की ऐसी विरासतें जहां-तहां धूल फांक रही हैं और सब मौन हैं।
यहां हजारों अमूल्य किताबों से भरे एक पुस्तकालय की कहानी नहीं है। यह तस्वीर है उस आजाद खयाल आधुनिक की पीढी की , जिसे मनोरंजन का शौक है। कैरियर बनाने की चिंताएं। मगर उसके पास साहित्य और संस्कृति को सहेजने के विचार दूर-दूर तक नहीं हैं। हालात ठीक नहीं।
साहित्य में अतीत और वर्तमान को पढ़ने-समझने के सूत्र छिपे होते हैं। भविष्य को भांपने की कुंजी भी समाहित रहती है। मुंशी प्रेमचंद्र की कलम से निकलीं गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, गबन को पढकर देखो। दहेज, अशिक्षा, नारी संघर्ष और अन्नदाता किसानों का दुख-दर्द सब कुछ तो इनमें समाया है। यह वो ज्वलंत मुद़दे हैं जिनसे आजाद हिन्दुस्तान आज तक जूझ रहा है।
दिल्ली से सटे गाजियाबाद में एक पुस्तकालय है। नाम है हरिश्चद्र लाइब्रेरी। दस बरस पहले नींव रखी गई थी। अब बीस हजार से ज्यादा किताबें हैं इसमें। गांधीजी की एन आटोबायोग्राफी, महर्षि दयानंद की सत्यार्थ प्रकाश, शिवाली की विषकन्या से लेकर विष्णु प्रभाकर की आवारा मशीहा, कमलेश्वर की कितने पाकिस्तान, निराला की निरुपमा, शरतचंद्र की देवदास.... सब कुछ है। हिन्दी में भी। इंग्लिश में भी। अफसोस, यदि नहीं है तो इनके पढ़ने वाले। रिकार्ड दिल दुखाता है।
एक तरफ मुन्नाभाई की गांधीगीरी का पूरा देश दीवाना है। नेता,अभिनेता शहर-शहर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते लोग। हांथों में अजब गांधीगीरी के फूल और जुबां पर जोशीले-भड़कीले नारे दिखाई देते हैं। मगर स्वाधीनता की पहली आवाज, पहली चिंगारी देने वाली जमीन पर किसी के पास इतना समय नहीं जो गांधीजी के दिल से निकली किताब सपनों के भारत के पन्ने भी उलट सकें। बापू की लिखी हिंद स्वराज अपने सौ साल पूरे कर चुकी है। देश भर में आयोजन तो हो रहे हैं मगर हिंद स्वराज को पढ़ने की फुर्सत शायद आयोजकों के पास भी नहीं है। अमर साहित्य गढ़ने वाली बाकी विभूतियों के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता नजर आता है। कमोवेश यही हालात तेजी से विकास और विस्तार की राह पर दौड़ लगाते बाकी शहरों के भी हैं।
यह सही है कि आईटी और मार्केटिंग ने रोजगार की असीम संभावनाएं पैदा की हैं। पत्रकारिता अब सिर्फ समाज सेवा नहीं, लाखों लोगों को नौकरी देने का भी काम कर रही है। पढ़ लिखकर कैरियर की चिंता करना अच्छी बात है मगर अपने पैरों पर खडे होकर भी साहित्य, संस्कृति से मुंह विचकाना न देश हित में है और न समाज हित में। और ना ही ऐसी पीढी के पीछे खड़ी एक नई पीढी के हित में। पर हो तो यही रहा है।
साहित्य पढ़ने और न पढ़ने वालों के आंकडे चौंकाते हैं। पचास से कम उम्र के लोग पुस्तकालयों में आते हैं मगर साहित्य की किताबों को छूते तक नहीं। युवाओं में साहित्य की किताबें मांगने वालों की संख्या न के बराबर है। युवा या तो सम-सामयकि मैग्जीन मांगते हैं या फिर सुरेन्द्र मोहन पाठक सरीखे लेखकों के सस्पेंस और थ्रिलर थीम के उपन्यास। पसंद चंपक, चाचा चौधरी और बाल कहानियां भी होती हैं पर साहित्य बिल्कुल नहीं। देश में पुस्तकालयों की दशा सुधारने को सुझाव मांगे जाते हैं तब यह जोशीली जवान पीढी एसी, फ्रिज, वाटर फिल्टर जैसे मुद़दों को तो उठाती है। नई पुरानी कृतियां मंगाने के सवाल कभी नहीं दागती।
बडे बजुर्ग इस दौड में बहुत आगे हैं। सच्चाई पुस्तकालयों के रिकार्ड बताते हैं। बार-बार साहित्य कुरेदने के बाद भी इस उम्र के लोग मनोरंजन की दूसरी किताबों की बजाए फिर से साहित्य ही पढना पसंद करते हैं। इस बात से भी गुरेज नहीं करते कि उन किताबों को वे कितनी बार दोहरा चुके हैं। आते हैं। हर बार नई किताब की फरमाइश करते हैं। नहीं मिलती तो पुराना साहित्य ही ले जाते हैं। वक्त पर लौटा भी जाते हैं। जैसे, पढने-लिखने का अनुशासन भी अकेले उनके ही जिम्मे आ गया हो।
सबकी हालत एक जैसी है। हर खबर पर युद़ध की तरह टूटती मीडिया की भीड में भी ऐसे लोग कम ही नजर आते हैं जो अतीत की धरोहर पुस्तकों को पढना चाहते हों। ऐसा होता तो उदयन शर्मा की फिर पढना इसे सिर्फ अलमारियों की शोभा न बढा रही होती। और तो और गोलवलकर को उनके ही संघ वाले पढने से जी न चुरा रहे होते। अटल, चंद्रशेख्ार की तरह राजनीति की लंबी पारी खेलने की इच्छा हर नेता रखता है मगर किताबें पढकर राजनीति के सूत्र और समीकरण जानना कोई नहीं चाहता। नौकरपेशा वर्ग का सवाल बचता है। इनके पास सब कुछ है। पद है। पैसा है। वैभव है। शापिंग के लिए माल्स और मल्टीप्लेक्स जाने का टाइम है। आपिफस से लौटने के बाद घर या बाहर मूवी देखने का समय भी है। नहीं है तो संस्कार, संस्कृति पर चर्चा करने की फुर्सत। वक्त विचार मंथन का है। आख्रिर हम कर क्या रहे हैं।
फ़रवरी 01, 2010
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