रात डेढ़ बजे मेरी आंख लगी ही होगी कि साथी ने फोन पर बताया कि एक बड़ी दुखद खबर है। प्रभाष जोशी नहीं रहे। सन्न रह गया। परसों शाम ही तो मैं जनसत्ता सोसाइटी के गार्ड को उनके नाम एक पत्र और लेख देकर आया था। कहीं वह लेख तो उनके भावुक मन को भेद नहीं गया? यह अपराध बोध मुझे भीतर तक झिंझोडे़ जा रहा था। यह लेख मैनें उन्हीं के आदेश-आग्रह पर लिखा था। रात में पत्नी को साथ लेकर जनसत्ता सोसाइटी पहुंचा, तो मेरा दिया लिफाफा गार्ड रूप में ही पड़ा था। गार्ड की लेटलतीफी कहें या लापरवाही, उसने मुझे जीवन भर के अपराध बोध से बचा लिया।
प्रभाषजी की दिली इच्छा थी कि जनसत्ता की शुरूआती टीम के साथी उनके प्रयोग पर अपने अनुभव एक जगह संजोएं। डेढ़ साल पहले दिल्ली आने के बाद से कुल जमा दो बार ही प्रभाषजी से मिलने उनके घर जा सका था। पहली बार अपने जन्मदिन पर, दूसरी बार उनके जन्मदिन पर। दोनों ही बार उन्होंने मुझसे कहा था, जनसत्ता के प्रयोग पर किताब लिखने की जिम्मेदारी तुम्हें ही लेनी चाहिए। यह काम तुमसे बेहतर कोई नहीं कर सकेगा। मैं अपनी इतर व्यस्तताओं के कारण प्रभाषजी के आदेश-आग्रह पर अमल टालता रहा। पिछले महीने जब इसी अखबार के पुराने साथी रवीन्द्र त्रिपाठी धरना देने के अंदाज में दफ्तर में बैठ गए तो लगा कि अब और नहीं टाल सकूंगा। आखिरकार चार पांच बैठकों में प्रस्तावित पुस्तक के लिए अपना लेख पूरा कर सका और जनसत्ता के शुरूआती दिनों का वस्तुनिष्ठ खाका खींच सका।
वह लेख लिखते समय मेरी आंखे कई बार भर आईं थीं। अब प्रभाषजी के जाने पर एक और लेख लिखना कितना भारी पड़ रहा है, शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। प्रभाषजी ने मेरा परिचय-संपर्क कोई साढ़े तीन-चार दशक पुराना है। वह नई दुनिया, इंदौर और मध्यदेश, भोपाल में कुछ समय पत्रकारिता करने के बाद साठ के दशक के उत्तरार्ध में दिल्ली आए थे और गाँधी शताब्दी संबंधी सामग्री तैयार करने के काम में लगे थे। मेरे पिताजी विनय भाई गांधी शांति प्रतिष्ठान के आजीवन कार्यकर्ताओं में थे। प्रभाषजी और उनके बीच जब-तब पत्राचार होता रहता था। 1972 में जब मोहर सिंह और माधो सिंह की अगुवाई में चंबल घाटी के बहुत से डकैतों ने जयप्रकाश नारायण के सामने समर्पण किया, तब पिताजी और प्रभाषजी उन लोगों में शामिल थे, जो चंबल के दस्यु गिरोहों के समर्पण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दे रहे थे। प्रभाषजी ने अनुपम मिश्र और श्रवण गर्ग के साथ मिलकर चंबल की बंदूकें- गांधी के चरणों में नाम से दस्यु समर्पण का एक जीवंत रिपोर्ताज लिखा। वह पॉकेट बुक के रूप में छपा था। प्रभाषजी सर्वोदयी और गांधी के काम में रमे ही थे और भवानी प्रसाद मिश्र के संपादन में निकलने वाली सर्वोदय आंदोलन की पत्रिका का कामकाज देख रहे थे कि इस पॉकेट को पढ़कर एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयंका ने उन्हें मुख्यधारा की पत्रकारिता में लौटने का निमंत्रण दे डाला। आरएनजी ने प्रभाषजी के घर आकर किस तरह उन्हें एक्सप्रेस समूह से जोड़ने के लिए राजी किया। यह किस्सा प्रभाषजी अलग से बयान कर चुके हैं। इसके बाद प्रभाषजी जेपी आंदोलन के मुखपत्र प्रजानीति से जुडे़, जो इमरजेंसी और सेंशरशिप लगने के बाद आसपास नामक सामाजिक-सांस्कृतिक अखबार में तब्दील हो गया, पर ज्यादा दिन चला नहीं। इस बीच प्रभाषजी ने न केवल आरएनजी का भरोसा हासिल कर लिया, बल्कि अंग्रेजी पर भी अच्छी पकड़ बना ली। प्रभाषजी की क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करने की गरज से आरएनजी ने उन्हें इंडियन एक्सप्रेस के क्रमश: अहमदाबाद, चंडीगढ़ और दिल्ली संस्करणों का स्थानीय संपादक बनाया। पर चूंकी प्रभाषजी मूलत: हिन्दी के पत्रकार थे और हिन्दी में काम करने की इच्छा रखते थे, इसलिए तब आरएनजी ने जनसत्ता निकालने का फैसला किया, तब उसकी कमान प्रभाषजी को सौंपी। स्टॉफ चुनने से लेकर भाषा-वर्तनी, लेआउट आदि के मामले में उन्होंने नए-नए प्रयोग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। प्रभाषजी खुद को जनसत्ता को बोलचाल की भाषा, नए तेवर का अखबार बनाने का जुनून था ही, उन्होंने यह जुनून ज्यादातर साथियों में भी कूट-कूटकर भर दिया था। नतीजतन, अखबार ने अपने प्रकाशन के शुरू के दो वर्ष में कई ऐसे प्रतिमान गढ़ दिए, जो दशकों से जमे-जमाए अखबारों के बूते की बात नहीं थी। राजनीति, समाज, संस्कृति और खेल सभी क्षेत्रों के बारे में सुव्यवस्थित और सुगठित खबरों तथा आलेखों ने उसे अलग ही पहचान दे दी थी।
बाद के वर्षों में प्रभाषजी पत्रकारिता में बाजारवाद के प्रभाव को लेकर बहुत चिंतित, बहुत बेचैन रहते थे। उनके कॉलम और भाषणों में यह चिंता और बेचैनी बार-बार और बहुत गहराई से रेखांकित होती थी, पर बाजार एक हकीकत है और जो किसी बख्शता भी नहीं है। जिन दिनों जनसत्ता दो लाख प्रतियों का आंकड़ा छू रहा था और उसमें पाठकों से यह अपील छापी जा रही थी कि चूंकि हमारी छपाई मशीन मांग के अनुरूप प्रतियां नहीं छाप सकती हैं, इसलिए आप लोग इसे मिल-बांटकर पढ़ें। उन दिनों जनसत्ता का बाजार था, और बाकी प्रतिद्वंद्वी अखबार बेजार थे।
प्रभाषजी में एक बहुत बड़ी खूबी लोगों को जोड़ने की थी। उन्होंने जनसत्ता की टीम में तो धुर वामपंथियों से लेकर समाजवादियों, सर्वोदयियों से लेकर हिन्दूवादियों तक को जोड़ा ही था, समाज, संस्कृति और राजनीति के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों से भी उनके अच्छे निजी संबंध थे। जिन राजनेताओं और पार्टियों की राजनीति पर वह खूब खरी-खोटी लिखते थे, वे भी उनके मुरीद थे। तभी तो उनके निधन की खबर सुनते ही जनसत्ता अपार्टमेंट में उनके दर्शन के लिए पहुंचने वालों का तांता थमने का नाम नहीं ले रहा था। इसमें आधी सदी से ज्यादा पुराने उनके मित्र और अनुज वेदप्रताप वैदिक भी थे, तो अभी-अभी पत्रकारिता शुरू करने वाले युवा भी। गोविंदाचार्य भी थे तो राजनाथ सिंह भी। नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी और राजेन्द्र यादव तो थे ही। प्रभाष जोशी के जाने के बाद हिन्दी के विशाल परिवार जोडे़ रख पाना किसी के वश की बात नहीं लगती। उनके सैकड़ों हजारों छोटे भाइयों में एक मैं भी हूं। अब किस को दादा कहूंगा, किसी परेशानी में पड़ने पर किससे सलाह मांगने जाउफंगा, सूझ नहीं पड़ता है। देवप्रिय अवस्थी: (साभार: अमर उजाला/ मीडिया सरकार से साभार)
जनवरी 29, 2010
प्रभाष जोशी: हद से अनहद

हिंदी पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी की याद में 28 जनवरी को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक पुस्तक-विमोचन हुआ। ‘हद से अनहद गए’ नामक इस पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने की ।
कुलदीप नैयर ने पुस्तक की पहली प्रति प्रभाष जोशी की पत्नी उषा जोशी जी को भेंट की। प्रभाष जी को याद करते हुए कुलदीप नैयर ने कहा कि प्रभाषजी का ख्वाब था कि कैसे सत्ता लोगों के हाथ में रहे और कैसे लोगों को बदला जाए। वे गांधीजी की तरह बिना हथियार उठाए लोगों के हालात बदलना चाहते थे। उन्होंने बताया कि प्रभाषजी की पढ़ाई हर किस्म की थी, वे सभी पार्टियों की फिलोसफी को जानते थे, वे कभी जेल नहीं गए लेकिन जेल जाने से घबराते नहीं थे। कुलदीप नैयर ने प्रभाषजी की याद में मीर का यह शेर सुनाया- बहुत गौर से सुन रहा था जमाना, हमीं सो गए कहते-कहते।
इस अवसर पर काफी संख्या में लेखक-पत्रकार मौजूद थे। टेलीविज़न के जाने माने चेहरे पुण्य प्रसून वाजपेयी ने प्रभाष जी को पत्रकारिता की मिसाल बताया। प्रभाष जी में खबर को सामान्य जनता की भाषा में लिखने की अद्भुत शैली थी जो आज की पत्रकारिता में खोती जा रही है। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने प्रभाषजी से जुड़ी अनेक स्मृतियां साक्षा कीं। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड और चुनाव आयोग सक्रिय हुए हैं लेकिन उनके बर्ताव में एक उथलापन है। इस मामले में प्रभाषजी का नज़रिया बिल्कुल अलग था। उन्होंने कहा कि प्रभाषजी कठिन से कठिन बात सरलता से समझा देते थे जबकि आज के संपादक और रिपोर्टर गूगल से बाहर नहीं जा पा रहे हैं।
इस अवसर पर प्रभाष जोशी के पुत्र सोपान जोशी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि प्रभाष जी पत्रकार बनने नहीं निकले थे वे तो ग्राम सेवा के लिए शिक्षा को छोड़कर पत्रकारिता से जुड़े । मंगलेश डबराल ने कहा कि प्रभाषजी ऐसे संपादक थे जो मूल रूप से लेखक थे। डबराल ने कहा कि प्रभाष जोशी ने जितना लिखा उतना किसी संपादक ने नहीं लिखा। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता का औपचारिक ढांचा तोड़ा और इसे अनौपचारिक बना दिया। उनका कहना था कि प्रभाषजी लोकवादी और वे धुनी रमाके और चिमटा बजाके पत्रकारिता करते रहे।
प्रभाष जोशी: हद से अनहद
साहित्यकार अशोक वाजपयी ने कहा कि प्रभाष जी एक मात्र ऐसे पत्रकार थे जिनके विषय में साहित्यकार तथा लेखकों ने भी लिखा। अशोक वाजपेयी ने कहा कि प्रभाषजी उन थोड़े पत्रकारों में से थे जिनकी आवाज साहित्यकारों में सुनी जाती रही है। हिन्दी पत्रकारिता शैली शून्य थी, प्रभाषजी ने अपनी शैली विकसित की। उन्होंने कहा कि मैं ऐसा पत्रकार नहीं जानता जो हिन्दी का प्रवक्ता बन गया हो। प्रभाषजी की कोशिश थी कि हिन्दी लेखकों की सार्वजनिक उपस्थिति और मान्यता बढे़। प्रभाषजी गांधीवादी निर्भयता के अन्तिम प्रवक्ता थे। उन्होंने कहा कि वैचारिक रूप से भले ही हम दोनों में मतभेद रहा हो, लेकिन उनकी नीयत पर कभी सवाल नहीं उठाया जा सकता है।
ओम थानवी ने जनसत्ता के जुडे़ अनुभवों को याद करते हुए बताया कि कैसे प्रभाष जोशी उन्हें जनसत्ता लेकर आए। उन्होंने पंजाब में अलगाववाद के दिनों को याद करते हुए कहा कि प्रभाष जोशी अकेले संपादक थे जिन्होंने आतंकवादियों का आचार संहिता को जनसत्ता में नहीं छापा।
नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सिर्फ हिंदी पत्रकारिता ही नहीं, हिंदी बौद्धिकता का प्रतिनिधित्व भी प्रभाष जी ने किया है। डेढ़ सौ पृष्ठों की पुस्तक का संचयन और संपादन लेखिका रेखा अवस्थी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा स्मित पराग ने किया है । इस पुस्तक में प्रभाष जोशी पर लिखे गए 37 लेख संकलित किए गए हैं। स्वराज प्रकाशन से छपी इस किताब में कुल 37 लेखकों, पत्रकारों और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लेख संकलित हैं।
कुलदीप नैयर ने पुस्तक की पहली प्रति प्रभाष जोशी की पत्नी उषा जोशी जी को भेंट की। प्रभाष जी को याद करते हुए कुलदीप नैयर ने कहा कि प्रभाषजी का ख्वाब था कि कैसे सत्ता लोगों के हाथ में रहे और कैसे लोगों को बदला जाए। वे गांधीजी की तरह बिना हथियार उठाए लोगों के हालात बदलना चाहते थे। उन्होंने बताया कि प्रभाषजी की पढ़ाई हर किस्म की थी, वे सभी पार्टियों की फिलोसफी को जानते थे, वे कभी जेल नहीं गए लेकिन जेल जाने से घबराते नहीं थे। कुलदीप नैयर ने प्रभाषजी की याद में मीर का यह शेर सुनाया- बहुत गौर से सुन रहा था जमाना, हमीं सो गए कहते-कहते।
इस अवसर पर काफी संख्या में लेखक-पत्रकार मौजूद थे। टेलीविज़न के जाने माने चेहरे पुण्य प्रसून वाजपेयी ने प्रभाष जी को पत्रकारिता की मिसाल बताया। प्रभाष जी में खबर को सामान्य जनता की भाषा में लिखने की अद्भुत शैली थी जो आज की पत्रकारिता में खोती जा रही है। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने प्रभाषजी से जुड़ी अनेक स्मृतियां साक्षा कीं। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड और चुनाव आयोग सक्रिय हुए हैं लेकिन उनके बर्ताव में एक उथलापन है। इस मामले में प्रभाषजी का नज़रिया बिल्कुल अलग था। उन्होंने कहा कि प्रभाषजी कठिन से कठिन बात सरलता से समझा देते थे जबकि आज के संपादक और रिपोर्टर गूगल से बाहर नहीं जा पा रहे हैं।
इस अवसर पर प्रभाष जोशी के पुत्र सोपान जोशी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि प्रभाष जी पत्रकार बनने नहीं निकले थे वे तो ग्राम सेवा के लिए शिक्षा को छोड़कर पत्रकारिता से जुड़े । मंगलेश डबराल ने कहा कि प्रभाषजी ऐसे संपादक थे जो मूल रूप से लेखक थे। डबराल ने कहा कि प्रभाष जोशी ने जितना लिखा उतना किसी संपादक ने नहीं लिखा। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता का औपचारिक ढांचा तोड़ा और इसे अनौपचारिक बना दिया। उनका कहना था कि प्रभाषजी लोकवादी और वे धुनी रमाके और चिमटा बजाके पत्रकारिता करते रहे।
प्रभाष जोशी: हद से अनहद
साहित्यकार अशोक वाजपयी ने कहा कि प्रभाष जी एक मात्र ऐसे पत्रकार थे जिनके विषय में साहित्यकार तथा लेखकों ने भी लिखा। अशोक वाजपेयी ने कहा कि प्रभाषजी उन थोड़े पत्रकारों में से थे जिनकी आवाज साहित्यकारों में सुनी जाती रही है। हिन्दी पत्रकारिता शैली शून्य थी, प्रभाषजी ने अपनी शैली विकसित की। उन्होंने कहा कि मैं ऐसा पत्रकार नहीं जानता जो हिन्दी का प्रवक्ता बन गया हो। प्रभाषजी की कोशिश थी कि हिन्दी लेखकों की सार्वजनिक उपस्थिति और मान्यता बढे़। प्रभाषजी गांधीवादी निर्भयता के अन्तिम प्रवक्ता थे। उन्होंने कहा कि वैचारिक रूप से भले ही हम दोनों में मतभेद रहा हो, लेकिन उनकी नीयत पर कभी सवाल नहीं उठाया जा सकता है।
ओम थानवी ने जनसत्ता के जुडे़ अनुभवों को याद करते हुए बताया कि कैसे प्रभाष जोशी उन्हें जनसत्ता लेकर आए। उन्होंने पंजाब में अलगाववाद के दिनों को याद करते हुए कहा कि प्रभाष जोशी अकेले संपादक थे जिन्होंने आतंकवादियों का आचार संहिता को जनसत्ता में नहीं छापा।
नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सिर्फ हिंदी पत्रकारिता ही नहीं, हिंदी बौद्धिकता का प्रतिनिधित्व भी प्रभाष जी ने किया है। डेढ़ सौ पृष्ठों की पुस्तक का संचयन और संपादन लेखिका रेखा अवस्थी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा स्मित पराग ने किया है । इस पुस्तक में प्रभाष जोशी पर लिखे गए 37 लेख संकलित किए गए हैं। स्वराज प्रकाशन से छपी इस किताब में कुल 37 लेखकों, पत्रकारों और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लेख संकलित हैं।
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