अगस्त 18, 2014

साहित्‍य

साहित्‍य में अतीत और वर्तमान को पढने-समझने के सूत्र छिपे होते हैं। भविष्‍य को भांपने की कुंजी भी समाहित रहती है। मुंशी प्रेमचंद्र की कलम से निकलीं गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, गबन को पढकर देखो। दहेज, अशिक्षा, नारी संघर्ष और देश के अन्‍नदाता किसानों का दुख-दर्द सब कुछ तो इनमें समाया है। यह वो ज्‍वलंत मुद़दे हैं जिनसे आजाद हिन्‍दुस्‍तान आज तक जूझ रहा है।

दिल्‍ली से सटे गाजियाबाद में एक पुस्‍तकालय है। नाम है हरिश्‍चद्र लाइब्रेरी। दस बरस पहले नींव रखी गई थी। अब बीस हजार से भी ज्‍यादा किताबें हैं इसमें। गांधीजी की एन आटोबायोग्राफी, महर्षि दयानंद की सत्‍यार्थ प्रकाश, शिवाली की विषकन्‍या से लेकर विष्‍णु प्रभाकर की आवारा मसीहा, कमलेश्‍वर की कितने पाकिस्‍तान, निराला की निरुपमा, शरतचंद्र की देवदास.... सब कुछ है। हिन्‍दी में भी। इंग्लिश में भी। अफसोस, यदि नहीं है तो इनके पढ़ने वाले। रिकार्ड दिल दुखाता है।

एक तरफ मुन्‍नाभाई की गांधीगीरी का पूरा देश दीवाना है। नेता,अभिनेता शहर-शहर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते लोग। हांथों में अजब गांधीगीरी के फूल और जुबां पर जोशीले-भड़कीले नारे दिखाई देते हैं। मगर स्‍वाधीनता की पहली आवाज, पहली चिंगारी देने वाली जमीन पर किसी के पास इतना समय नहीं जो गांधीजी के दिल से निकली किताब सपनों के भारत के पन्‍ने भी उलट सकें। बापू की लिखी हिंद स्‍वराज अपने सौ साल पूरे कर चुकी है। देश भर में आयोजन तो हो रहे हैं मगर हिंद स्‍वराज को पढने की फुर्सत शायद आयोजकों के पास भी नहीं है। अमर साहित्‍य गढ़ने वाली बाकी विभूतियों के साथ भी ऐसा ही वर्ताव होता नजर आता है। कमोवेश यही हालात तेजी से विकास और विस्‍तार की राह पर दौड लगाते बाकी शहरों के भी हैं।

यह सही है कि आईटी और मार्केटिंग ने रोजगार की असीम संभावनाएं पैदा की हैं। पत्रकारिता अब सिर्फ समाज सेवा नहीं, लाखों लोगों को नौकरी देने का भी काम कर रही है। पढलिखकर कैरियर की चिंता करना अच्‍छी बात है मगर अपने पैरों पर खढ1े होकर भी साहित्‍य, संस्‍कृति से मुंह विचकाना न देश हित में है और न समाज हित में। और ना ही ऐसी पीढी के पीछे खड़ी एक नई पीढी के हित में। पर हो तो यही रहा है।

साहित्‍य पढने और न पढने वालों के आंकडे चौंकाते हैं। पचास से कम उम्र के लोग पुस्‍तकालयों में आते हैं मगर साहित्‍य की किताबों को छूते तक नहीं। युवाओं में साहित्‍य की किताबें मांगने वालों की संख्‍या न के बराबर है। युवा या तो सम-सामयकि मैग्‍जीन मांगते हैं या फिर सुरेन्‍द्र मोहन पाठक सरीखे लेखकों के सस्‍पेंस और थ्रिलर थीम के उपन्‍यास। उनका इंटृेस्‍ट चंपक, चाचा चौधरी और बाल कहानियों को पढ़ने में भी होता है पर साहित्‍य में बिल्‍कुल नहीं। देश में पुस्‍तकालयों की दशा सुधारने को सुझाव मांगे जाते हैं तब यह जोशीली जवान पीढी एसी, पिफ्रज, वाटर फिल्‍टर जैसे मुद़दों को तो उठाती है। नई पुरानी कृतियां मंगाने के सवाल कभी नहीं दागती।

बडे बजुर्ग इस दौड में बहुत आगे हैं। सच्‍चाई पुस्‍तकालयों के रिकार्ड बताते हैं। बार-बार साहित्‍य कुरेदने के बाद भी इस उम्र के लोग मनोरंजन की दूसरी किताबों की बजाए फिर से साहित्‍य ही पढना पसंद करते हैं। इस बात से भी गुरेज नहीं करते कि उन किताबों को वे कितनी बार दोहरा चुके हैं। आते हैं। हर बार नई किताब की फरमाइश करते हैं। नहीं मिलती तो पुराना साहित्‍य ही ले जाते हैं। वक्‍त पर लौटा भी जाते हैं। जैसे, पढने-लिखने का अनुशासन भी अकेले उनके ही जिम्‍मे आ गया हो।

सबकी हालत एक जैसी है। हर खबर पर युद़ध की तरह टूटती मीडिया की भीड में भी ऐसे लोग कम ही नजर आते हैं जो अतीत की धरोहर पुस्‍तकों को पढना चाहते हों। ऐसा होता तो उदयन शर्मा की फिर पढना इसे सिर्फ अलमारियों की शोभा न बढा रही होती। और तो और गोलवलकर को उनके ही संघ वाले पढने से जी न चुरा रहे होते। अटल, चंद्रशेख्‍ार की तरह राजनीति की लंबी पारी खेलने की इच्‍छा हर नेता रखता है मगर किताबें पढकर राजनीति के सूत्र और समीकरण जानना कोई नहीं चाहता। नौकरपेशा वर्ग का सवाल बचता है। इनके पास सब कुछ है। पद है। पैसा है। वैभव है। शापिंग के लिए माल्‍स और मल्‍टीप्‍लेक्‍स जाने का टाइम है। आपिफस से लौटने के बाद घर या बाहर मूवी देखने का समय भी है। नहीं है तो संस्‍कार, संस्‍कृति पर चर्चा करने की फुर्सत। वक्‍त विचार मंथन का है। आख्रिर हम कर क्‍या रहे हैं।


















आजादी के दीवाने-1

इस देश की सरहद को कोई छू नहीं सकता

(कारगिल योद्धा ब्रिगेडियर अनिल शर्मा, कमांडेंट जाट रेजीमेंटल सेंटर बरेली)


कारगिल की लड़ाई में हीरो बनकर उभरे थे ब्रिगेडियर शर्मा 

पलटन 17-जाट का नेतृत्व करते हुए इन्होंने फतह की दो चोटियां 

प्वाइंट 4545 और पिंपल कांप्लैक्स से मार भगाए थे सभी दुश्मन 

कितने ही दुश्मनों को ढेर किया, भारी मात्रा में हथियार-बारूद जब्त






हम वो पत्थर हैं जिसे दुश्मन हिला सकते नहीं, आजादी को हरगिज मिटा सकते नहीं..।

हम स्वतंत्रता की 66वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। जश्न के बीच आजादी के गीत गा रहे हैंं। और याद कर रहे हैं उन वीरों को जिन्होंने जंग-ए-आजादी में वीरता का मिसाल-बेमिसाल इतिहास बनाया। सन् 47 के बाद देश पर जब-जब संकट में आया, तो जाबांजों ने फिर वैसा ही पराक्रम दिखाया। आजादी को सलामत रखने के लिए हिम्मत और होसले की हर बार नई इबारत लिखी। चाहे जंग सन् 62 की रही हो या 65, 71 और 99 में, वतन के रखवालों के आगे दुश्मनों ने हर बार मुंह की खाई है। यह अपनी भारतीय सेना ही है, जिसने घर-बाहर सब जगह अमन के दुश्मनों को नानी याद दिलाई है। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर ‘हिन्दुस्तान’ ऐसे ही कुछ वीर गाथाएं सुना रहा है। वीरभूमि बरेली से जुड़े हीरो को एक-एक कर सामने ला रहा है। 

अनुरोध
बरेली। उस वक्त सरहद पार कर दुश्मन देश में घुस आया था। जान से प्यारी कश्मीर पर कब्जे के इरादे से उसने कारगिल की चोटियों पर कब्जा जमाया था। जाट रेजीमेंटल सेंटर बरेली के कमांडेंट ब्रिगेडियर अनिल शर्मा उन दिनों लेफ्टीनेंट कर्नल के रूप में एलओसी पर तैनात थे और अपनी पलटन 17-जाट में सैकेंड इन कमांड थे। दुश्मनों को कारगिल से बाहर खदेड़ने के लिए लड़ाई छिड़ी तो 20 मई को 17-जाट को कारगिल जाकर मोर्चा संभालने को कहा गया। 18 हजार फीट ऊंचाई, बर्फ से ढकी चोटियां और उस पर मौसम की मार। हालात बहुत विपरीत थे मगर अनिल शर्मा के नेतृत्व में उनकी पलटन तुरंत कारिगल कूच कर गई। 72 घंटे पैदल चलकर रेजीमेंट पलटन कश्मीर की मस्को घाटी में पहुंची, जहां से आगे दुश्मनों ने प्वांइट 4545 चोट पर कब्जा कर रखा था। घुसपैटियों के साथ पाकिस्तान सेना भी वहां जमी थी।
कर्नल शर्मा ने साथियों के साथ वहां पोजोशन ली और ऑपरेशन शुरू करते हुए शाम 6 बजे से तड़के पांच बजे तक ही सिर्फ 11 घंटे में 24 मई को प्वाइंट 4545 (पिंपल-1) से दुश्मनों को खदेड़ दिया। पलटन का अगला टार्गेट पिंपल कांपलेक्स (चोटी-2) थी। यह ऑपरेशन बड़ा था और कहीं ज्यादा जोखिम भरा भी। दुश्मनों ने पिंपल-2 पर बंकर बना रखे थे और बगैर पूरी लोकेशन जाने वहां हमला करना संभव नहीं था। इसलिए लेफ्टीनेंट कर्नल शर्मा की अगुवाई में फौज ने पहले पेट्रोलिंग के जरिए वहां के पूरे हालात समझे। इसके लिए प्राइमरी ऑपरेशन 3 जुलाई तक चला। 4 जुलाई को पूरी तैयारी से 17-जाट के तोपखाना ने दुश्मनों के ठिकानों पर हमला बोल दिया। बोफोर्स तोपों ने आग उगली तो दुश्मन के पैर उखड़ने लगे। दो दिन तक आर्टिलरी फायरिंग के बाद मोटार्र, मीडिया और हेवी मशीनगन जैसे हथियारों से लैस भारतीय पलटन पलटन आगे बढ़ी।
भारी बर्फवारी, बहुत ज्यादा ऊंचाई की वजह से जब सांस लेना भी मुश्किल था, ऐसी मुश्किल स्थिति में जवानों ने चोटी की चढ़ाई करते हुए आक्रमण जारी रखा। चार दिन तक आमने-सामने की भीषण लड़ाई हुई। आखिरकार भारतीय जवानों की वीरता के आगे दुश्मन टिक नहीं सका। 4 जुलाई से शुरू हुआ ऑपरेशन 8 जुलाई को पिंपल काम्पलैक्स फतह के साथ पूरा हुआ। इसमें जाट पलटन ने कितने ही दुश्मनों को ढेर किया। भारी मात्रा में गोला, बारूद और हथियार बरामद हुए। पाकिस्तान की नार्दन लाइट इन्फेन्ट्री के कारगिल घुसपैठ में शामिल होने के सबूत के रूप में जवानों के आईकार्ड, हथियार मिले। इस लड़ाई में 17-जाट ने अपने एक आफिसर, एक जेसीओ और 35 जवानों को खोकर मातृभूमि की रक्षा का फर्ज निभाया। साहस और पराक्रम के लिए उस वक्त लेफ्टीनेंट कर्नल अनिल शर्मा को नार्दन आर्मी कमांडर कमंडेशन कार्ड का सम्मान दिया गया। बिग्रेडियर अनिल शर्मा अब जेआरसी, बरेली के कमांडेंट हैं। जेआरसी के म्यूजियम में पाकिस्तान सेना के वो हथियार, वर्दियां, आईकार्ड अब भी सुरक्षित हैं, जिन्हें ब्रिगेडियर शर्मा की अगुवाई में भारतीय सेना ने कारगिल से बरामद किया था। कारगिल की गाथा पर ब्रिगेडियर अनिल शर्मा कहते हैं कि सरहद सलामत रहे और देश में अमन कामय रहे, हर भारतवासी यही चाहता है। देश की रक्षा को सेना हमेशा तैयार है।


ब्रिगेडियर शर्मा का पूरा परिवार देश सेवा में 

मूलत: झांसी के रहने वाले ब्रिगेडियर अनिल शर्मा के पिता एचएल शर्मा आर्मी में रहे और उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया था। भाई सुनील शर्मा आर्मी में कर्नल हैं। एक बहनोई वायुसेना में एयर कोमडोर और दूसरे गु्रप कैप्टन रहे हैं। 1960 में जन्मे अनिल शर्मा ने 1981 में भारतीय सेना ज्वाइन की थी। 1987 में शादी हुई। 1999 में जब वह कारगिल की लड़ाई लड़ रहे थे, तो बेटा दस साल का था जो  अब माइक्रोसॉफ्ट, अमेरिका में इंजीनियर हैं।



ब्रिगेडियर की बात


1-
मजबूत गवर्नेंस से रुकेंगे दंगे
पश्चिमी यूपी में हाल के दिनों में पहले मुजफ्फरनगर और फिर सहारनपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए। हालात इतने बेकाबू हुए कि प्रशासन को सेना बुलानी पड़ी। दंगे और आर्मी कॉल के सवाल पर ब्रिगेडियर अनिल शर्मा कहते हैं कि फसाद रोकने के लिए मजबूत गवर्नेंस का होना जरूरी है। कानून व्यवस्था कायम रखने के लिए ठोस फैसले हों। लोकल इश्यू, विवाद क्यों हो रहे हैं, विवादों को निपटाने में कहां भूल हो रही है, इसे प्रमुखता से देखना पड़ेगा। शिक्षा, खुशहाली, पारदर्शिता और ईमानदारी ऐसे सूत्र हैं, जो हर मुश्किल आसान कर देते हैं। दंगा कंट्रोल को सेना के इस्तेमाल पर ब्रिगेडियर बोले : आर्मी को जो टास्क मिलता है, उसे हर कीमत पर पूरा करती है। फिर चाहे वो बार्डर हो या देश के भीतर।

2-
हर कोई समझे आजादी के मायने
बिग्रेडियर अनिल शर्मा कहते हैं कि आजादी के मूल्य क्या होते हैं, हर किसी को इसे समझना चाहिए। देश की सेवा का मध्यम कोई भी हो सकता है, मगर देखना ये होगा कि हम वतन के लिए क्या कर रहे हैं। स्वतंत्रा दिवस याद दिलाता है कि गुलामी दूर भगाने को देश के लोगों ने कैसी-कैसी कुर्बानियां दीं। वैसे ही आजादी के बाद देश की रक्षा का फर्ज निभा रहे हैं। अमन और भाईचारा कायम रहे, देश और समाज उन्नति के रास्ते पर आगे बढ़े, सभी मिलकर इस दिशा में काम करें।

3-हाल में चिनाब नदी से बहकर पाकिस्तानी सीमा में पहुंचे बीएसएफ जवान की सकुशल वापसी को ब्रिगेडियर अनिल शर्मा दोनों देशों के लिए बहुत शुभ संकेत मानते हैं। सांस्कृतिक, एतिहासिक और धार्मिक स्वरूप भारत-पाकिस्तान का एक जैसा है। सीमा पर शांति होना दोनों देशों के लिए अच्छा है। रही बात सेना की तो शांति के माहौल में दोनों देश की सेनाओं के बीच बातचीत बनी रहना जरूरी है। पाकिस्तान ने जिस तरह से बीएसएफ के जवान को सलामती से भारत को लौटाया है, यह अच्छा संकेत है।