....अनुरोध भारद्वाज
तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा....! नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जुबान से निकले इन दो शब्दों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनाक्रोश का ज्वार ला दिया था। अंग्रेज गए। आजादी मिली मगर नेताजी कहीं खो गए। आज होते भी तो रो रहे होते। उनकी कुर्बानी क्या खूब सिला दिया हमने। आजादी की लौ जलाने को जिन घरानों ने मुसीबतों के गहरे दरिया पार किए। अंग्रेजों से जंग का ऐलान किया। घर छोड़े। देश छोड़े। खुद भूखे रहे। बच्चों को भूखा रखा। हम उनको भी भूल गए। नेताजी सुभाष के इस -अवतार- में सब कुछ छिपा है। सब कुछ आइने की तरह....
1942...! बर्मा के जंगलों में जंग छिड़ी थी। अंग्रेजी फौज की कमान जनरल मोहन सिंह के हाथों में थी। न हिम्मत कम थी, न हौंसला, मगर दुश्मन भारी पड़ रहे थे। जापानी सेना की घेराबंदी के बीच मोहन सिंह बार-बार पीछे से हथियार, गोला, बारूद की मदद मांग रहे थे। लड़ाई के मैदान में फंसी उस टुकड़ी में कुछ अंग्रेज होते तो मदद पहुंच भी जाती। मगर थे तो सिर्फ हिन्दुस्तानी। मौत की उस आंधी में हिन्दुस्तानियों को मरता छोड़ गोरों ने मुंह फेर लिया। जापानियों की आग उगलती तोपें, गोलियों की बौछार करती मशीनगनें और सामने थे मुट़ठी भर हिन्दुस्तानी लड़ाके। जान पर बन आई थी। कई दिनों से भूखे-प्यासे लड़ते रहे। न तोप, न गोले। लड़ते रहे। जान बच गई। जिंदगी और मौत की उस जंग से निकले यही यही वो लम्हे थे, जिसने हिन्दुस्तानियों से कूरता की हद तक नफरत करने वाले अंग्रेजों के खिलाफ एक नई फौज की इबारत लिखी। अंग्रेजों की बेवफाई से जनरल मोहन गुस्से में थे। आंखों से शोले निकल रहे थे। कसम खा ली- जंग अब जापानियों से नहीं, अंग्रेजों से होगी। दो-चार लड़ाके बचे थे। सबने अंग्रेजी वर्दियां उतार फेंकी। बचते-बचाते थाईलेंड पहुंचे। दिल में आजादी की चिंगारी थी। आंखों में आजादी के सपने। मकसद- अंग्रजों को नहीं छोड़ेगे। जनरल मोहन के प्यारों ने थाई जमीन पर इंडियन नेशनल आर्मी का आगाज कर डाला। जंग कोई भी हो, हौंसले और हथियारों से ही जीती जाती है। सवाल अब आईएनए के लिए हथियार और गोला-बारूद जुटाने का था। थाइलेंड में बसे हिन्दुस्तानियों को पता लगा, तो हाथ बढ़ने लगे। हिन्दुस्तान से दूर थाईलेंड की धरती पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र तैयारी हो रही थी। सब कुछ छिप-छिपकर। इस आहूति में सबसे आगे थे सरदार अरूर सिंह। बैंकाक के अमीर शहरियों में से एक। सरदार अरूर की जोशीली पहल थी। हर तरफ से हाथ आगे बढ़ने लगे।
अंग्रेजों के खिलाफ हो रहीं सशस्त्र तैयारी की खबर जापानियों तक पहुंच गई थी। जापानी से मोहन सिंह के पास दोस्ती के संदेश भेज रहे थे। चाहते थे, जापानी सेना की अगुआई हिन्दुस्तानी अफसर करें। मगर मोहन सिंह ने ऐसा हरगिज नहीं चाहते थे। वह समझ चुके थे कि अंग्रेज हारे तो हिन्दुस्तान पर हुकूमत जापानी करेंगे। इसलिए, दोस्ती के प्रस्ताव ठुकरा दिए। हिन्दुस्तानियों के साथ लेकर अंग्रेजों से लड़ने की ठान ली। इधर जो काम नेताजी सुभाष कर रहे थे। उधर, आजादी की वैसी ही मशाल मोहन सिंह ने उठा रखी थी। हिन्दुस्तान से क्रांति की खबरें थाईलेंड तक पहुंच रही थीं। अंग्रेजों ने नेताजी को कलकत्ता में नजरबंद कर रखा था। ऐसे में आईएन आर्मी ने एक प्लान बनाया। नेताजी को अंग्रेजों की नजबंदी से निकालने का प्लान। मदद में बैंकाक से एक टोली भेजी गई। टोली की अगुआई करने खुद सरदार अरूर सिंह आए। रणनीति काम आई। नजरबंदी में रहते-रहते नेताजी खुद भी सरदारों की शक्ल में आ गए थे। इससे काम आसान हो गया। अंग्रेज सेना को चकमा देकर नेताजी की जगह किसी और ने ली और नेताजी वहां से निकल लिए। मंजिल दूर थी और रास्ता कठिन। सरदार रूरसिंह और उनके साथी नेताजी को अमृतसर ले गए। पड़ाव था स्वर्ण मंदिर। यहां से नेताजी के साथ ज्ञानी प्रीतम सिंह भी हो गए। अमृतसर से बैंकाक जाने को अफगान का रास्ता चुना गया। काबुल दर्रा पार किया कितने ही दिन पैदल चले। बैंकाक पहुंचे। बैंकाक में नेताजी का पड़ाव सरदार अरूर सिंह का घर बना। ज्ञानी प्रीतम सिंह साथ थे। नेताजी कौन थे, घर में किसी को नहीं बताया गया था। अरूर सिंह की पत्नी तारावंती को भी नहीं। मेहमानों के आने से बच्चे खुश थे मगर तारावंती परेशान। अरुरसिंह के बच्चे राजकुमारी, सरजीत, अवतार अंजान मेहमान से घुल-मिल गए थे। नेताजी सुभाष अपने नन्हे साथियों के संग खेलते थे। उनका मन बहलाते थे। घर में चुपके-चुपके मंत्रणाएं होती थी। मेहमान के साथ सरदार अरूर अब बहुत व्यस्त हो गए थे । न बच्चों के लिए वक्त था और न पत्नी के लिए...।
रणनीतियां बनती रहीं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस युद्व की तरह तैयारियां कर रहे थे। उनकी प्रतिभा और रणनीति कौशल किसी से छिपा नहीं था। वर्तमान और भविष्य को भांपकर एक बड़ा फैसला लिया गया। आईएनए के सुप्रिम कमांडर नेताजी चुन लिए गए। यहां से इंडियन नेशनल आर्मी ने आजाद हिंद फौज की शक्ल ले ली। हिन्दुस्तानी लड़ाके जुड़ते गए और नेताजी की ताकत बढ़ती गई। आजाद हिंद फौज का संघर्ष पूरा विश्व ने देखा। मगर क्रांति की यह लौ जलाने में अहम भूमिका निभाने वाले सरदार अरूर सिंह और उनके परिवार के साथ फिर क्या कुछ हुआ, ये कहानी शायद ही किसी को पता होगी...। क्रमश :
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( स्वतंत्रा सेनानी अरूर सिंह के पुत्र सरदार अवतार सिंह की जुबानी-बातचीत पर आधारित)
