मौत की रेल
-अनुरोध भारद्वाज-
मौत की रेल में जिंदगी का सफर। जिंदगी और मौत से जूझती जिंदगी और छुक-छुक कर पटरियों पर दौड़ती रेल। अपनी दुनियां, बेगाने लोग। न रिश्ते, न बंधन। अपने-अपने स्वार्थ, अपने-अपने सुख। अनु मैडम चल बसीं। पति की आंखों के सामने सफर में मौत का झोका आया था। साथ उड़ा ले गया। बेचारे वकील साहब जीवनसाथी की जान नहीं बचा पाए। बचा भी लेते! यदि रेल रुक जाती, रेल अफसर संवेदनहीन न होते, मगर जमाने की संवेदनाएं जिंदा ही कहां थीं ?हाईकोर्ट के वकील आरपीएस चौहान पत्नी अनु चौहान के साथ इलाहबाद से दिल्ली आ रहे थे। सफर प्रयागराज एक्सप्रेस का था जो तेज कदमों से प्रयाग की ओर दौड़ रही थी। शुक्रवार का दिन था। सुबह के पांच बजे थे। अलीगढ़ कबका पीछे छूट चुका था। गाजियाबाद आने वाला था। सूरज निकलने से पहले दैनिक कार्यों से निवृत होने की आदत अनु चौहान ने सफर में भी नहीं छोड़ी। बर्थ से उठकर बोगी के वॉश बेसिन पर पहुंची और ब्रश करने लगीं। अचानक रेलगाड़ी ने हिचकोला लिया और अनु संतुलन खो बैठीं। खिड़की खुली थी। चलती गाड़ी से नीचे गिर पड़ीं। पत्नी को गिरते देखा तो वकील साहब दौड़े। गाड़ी रुकवाने के लिए चीखे, चिल्लाए, बहुत शोर मचाया मगर उनकी सुनने वाला कौन था। गाड़ी तब रुकी, जब गाजियाबाद आ गया। पीछे पटरियों के पास तड़पतीं रह गई घायल पत्नी की चिंता में चौहान साहब स्टेशन पर दौडे़। गिरते पड़ते भागकर जीआरपी थाने पहुंचे। इस उम्मीद में कि रेल अफसर पीछे के चोला स्टेशन पर संदेश भिजवाकर अनु को प्राथमिक इलाज दिला दें और पीछे आ रही दूसरी गाड़ी से गाजियाबाद भिजवा देंगे। ऐसे मौकों पर हमेशा संवेदनहीन साबित होने वाली जीआरपी के दरोगा और सिपाहियों को पता लगा तो मदद में आगे आ गए। वकील साहब को लेकर तुरंत स्टेशन मास्टर के पास पहुंचे। अनु की मदद वहीं से हो सकती थी। जीआरपी वाले कहते रहे, वकील साहब गिड़गिड़ाते रहे मगर संवेदनहीन स्टेशन मास्टर नहीं पसीजा। मदद नहीं की, बदसलूकी जरूर करता रहा। नतीजा, अनु चौहान चल बसीं। जब तक पीछे के स्टेशन पर खबर पहुंची और घायल अनु को दूसरी गाड़ी से गाजियाबाद भिजवाया गया, बहुत देर हो चुकी थी। पति को पुकारते पुकारते अनु की सांसें थम गईं। और अपने पीछे छोड़ गईं अनगिनत सवाल। ऐसे सवाल, जिनका जवाब रेलवे के अफसरों के देना होगा। बड़ा कौन है, जिंदगी या रेल। वकील साहब के कहने पर रेलवे वाले तुरंत अनु चौहान की खबर ले लेते तो किसी का क्या जाता ? पता लगा है, रेलवे ने जांच बिठा दी है। मगर इस जांच से क्या अनु चौहान लौटकर आ जाएंगी, क्या है इसका रेलवे पर जवाब ?
-अनुरोध भारद्वाज-
मौत की रेल में जिंदगी का सफर। जिंदगी और मौत से जूझती जिंदगी और छुक-छुक कर पटरियों पर दौड़ती रेल। अपनी दुनियां, बेगाने लोग। न रिश्ते, न बंधन। अपने-अपने स्वार्थ, अपने-अपने सुख। अनु मैडम चल बसीं। पति की आंखों के सामने सफर में मौत का झोका आया था। साथ उड़ा ले गया। बेचारे वकील साहब जीवनसाथी की जान नहीं बचा पाए। बचा भी लेते! यदि रेल रुक जाती, रेल अफसर संवेदनहीन न होते, मगर जमाने की संवेदनाएं जिंदा ही कहां थीं ?हाईकोर्ट के वकील आरपीएस चौहान पत्नी अनु चौहान के साथ इलाहबाद से दिल्ली आ रहे थे। सफर प्रयागराज एक्सप्रेस का था जो तेज कदमों से प्रयाग की ओर दौड़ रही थी। शुक्रवार का दिन था। सुबह के पांच बजे थे। अलीगढ़ कबका पीछे छूट चुका था। गाजियाबाद आने वाला था। सूरज निकलने से पहले दैनिक कार्यों से निवृत होने की आदत अनु चौहान ने सफर में भी नहीं छोड़ी। बर्थ से उठकर बोगी के वॉश बेसिन पर पहुंची और ब्रश करने लगीं। अचानक रेलगाड़ी ने हिचकोला लिया और अनु संतुलन खो बैठीं। खिड़की खुली थी। चलती गाड़ी से नीचे गिर पड़ीं। पत्नी को गिरते देखा तो वकील साहब दौड़े। गाड़ी रुकवाने के लिए चीखे, चिल्लाए, बहुत शोर मचाया मगर उनकी सुनने वाला कौन था। गाड़ी तब रुकी, जब गाजियाबाद आ गया। पीछे पटरियों के पास तड़पतीं रह गई घायल पत्नी की चिंता में चौहान साहब स्टेशन पर दौडे़। गिरते पड़ते भागकर जीआरपी थाने पहुंचे। इस उम्मीद में कि रेल अफसर पीछे के चोला स्टेशन पर संदेश भिजवाकर अनु को प्राथमिक इलाज दिला दें और पीछे आ रही दूसरी गाड़ी से गाजियाबाद भिजवा देंगे। ऐसे मौकों पर हमेशा संवेदनहीन साबित होने वाली जीआरपी के दरोगा और सिपाहियों को पता लगा तो मदद में आगे आ गए। वकील साहब को लेकर तुरंत स्टेशन मास्टर के पास पहुंचे। अनु की मदद वहीं से हो सकती थी। जीआरपी वाले कहते रहे, वकील साहब गिड़गिड़ाते रहे मगर संवेदनहीन स्टेशन मास्टर नहीं पसीजा। मदद नहीं की, बदसलूकी जरूर करता रहा। नतीजा, अनु चौहान चल बसीं। जब तक पीछे के स्टेशन पर खबर पहुंची और घायल अनु को दूसरी गाड़ी से गाजियाबाद भिजवाया गया, बहुत देर हो चुकी थी। पति को पुकारते पुकारते अनु की सांसें थम गईं। और अपने पीछे छोड़ गईं अनगिनत सवाल। ऐसे सवाल, जिनका जवाब रेलवे के अफसरों के देना होगा। बड़ा कौन है, जिंदगी या रेल। वकील साहब के कहने पर रेलवे वाले तुरंत अनु चौहान की खबर ले लेते तो किसी का क्या जाता ? पता लगा है, रेलवे ने जांच बिठा दी है। मगर इस जांच से क्या अनु चौहान लौटकर आ जाएंगी, क्या है इसका रेलवे पर जवाब ?