
अनुरोध भारद्वाज
पश्चिमी बंगाल में दार्जिलिंग के पास एक गांव है नक्सबाड़ी। गांव की पहचान यहां रहने वाले गरीब और अशिक्षित आदिवासी हैं। नक्सलवाद और नक्सली समस्या की शुरूआत इसी गांव की देन है। आजादी के बीस साल बाद 20 मई 1967 को इस गांव के मजदूर नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल की अगुआई में दबंग जमींदार उनकी गैरकानूनी सत्ता के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ था। अब आधे से ज्यादा देश इस कथित हिंसक आंदोलन की चपेट में है और सरकार कुछ कर नहीं पा रही।
आजाद हिन्दुस्तान में अब रोज की सबसे बड़ी खबर या तो आतंकवाद है या नक्सलवाद। एक गांव का शांत आंदोलन अब इतनी हिंसक हो चुका है कि हर तरफ खूंरेज इबारत लिखी जा रही है। बंगाल, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्टृ, यहां तक कि पूर्वी यूपी के कुछ जिले भी नक्सलाइट आंदोलन की आग में जल रहे हैं। कुछ महीना पहले महाराष्टृ के गढ़ चिरौली जिले के जंगल में नक्सलियों ने 32 पुलिसकर्मियों की हत्या कर दी थी। इसके बाद केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय माकन ने राज्यसभा में जानकारी दी थी कि पिछले तीन सालों में 25 सौ से ज्यादाब बेकसूर गांववाले और 760 से अधिक पुलिसकर्मी नक्सली हिंसा की भेंट चढ़ चुके हैं। नक्सली संगठन इतने ताकतवर हो चुके हैं कि सरकार को इनके चंगुल से रेलगाडि़यों को बचाना भी मुश्किल साबित हो रहा है। ज्यादा समय नही हुआ, जब नक्सलियों ने पश्चिमी बंगाल के मिदनापुर जिले में राजधानी एक्सप्रेस को बंधक बना लिया था। क्योंकि अब नक्सलियों की अगुआई माओवादी कर रह रहे हैं, इसलिए इनको और ज्यादा ताकत मिल रही है।
नक्सली समस्या से जूझते देश में अब इस आंदोलन की वजह को लेकर बहस छिड़ी हुई है। सरकार नक्सलियों को मूल रास्ते से भटके लोगों की जमात बताकर उनको रास्ता दिखाने की कोशिश तो कर रही है मगर समस्या के मूल में जाने की असल कोशिश से अब भी बचा जा रहा है।
दरअसल, नक्सबाड़ी गांव में इस आंदोलन की एक मात्र वजह ये थी कि एक आदिवासी अपनी जमीन पर कब्जा हासिल करने को कोर्ट से आदेश तो ले आया था मगर बाहुबली जमींदार के आगे उसकी एक नहीं चल रही थी। गरीबों को न्याय की दुहाई देने वाला प्रशासन भी तब मौन होकर बैठ गया था। जमींदारों के आतंक के खिलाफ तब गरीब आदिवासियों ने शांत आंदोलन की नींव रखी थी जो बाद में हिंसक राह पर चल पड़ा। पहले बंगाल इसकी जद में आया, फिर बाकी प्रदेश। बिहार को ही लें तो इसका उत्तरी क्षेत्र में आदिवासियों की बहुलता है। जंगल और जमीन से अपना पेट भरने वाले यहां के आदिवासी नक्सली आंदोलन से इसलिए जुड़े, क्योंकि नेताओं और दलालों ने इनका जीना दूभर कर रखा है। कोयला, लोहा, अभ्रक की खानों से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में ऐसे धनपति गरीब आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं और उनके आतंक से मुक्ति पाने को आदिवासी नक्सली ताकत की शरण में जा रहे हैं। गरीबी और अमीरी की खाई ने इस आंदोलन को ऐसे मुकाम पर पहुंचा दिया है कि अब एक तरफ नक्सली ग्रुप बंदूकें ताने हैं तो दूसरी ओर ज्यादा से ज्यादा जमीनें हथियाए बैठे अगड़ी जातियों के लोग रणवीर सेना, कुंअरसेना बनाकर किसी को भी मिटाने को तैयार हैं। लगातार खूनी टकराव हो रहे हैं। नक्सली पुलिस के खिलाफ इसलिए खूनी तेवर अपना रहे हैं, क्योंकि कानून के पहरेदारों ने हमेशा बर्चस्व की लड़ाई में अमीर और ताकतवर लोगों का साथ दिया है। यही वजह है कि नक्सली बार-बार पुलिस और सुरक्षाबलों के कैम्पों पर धावा बोल रहे हैं।
सरकार का नजरिया इतना बुरा है कि नक्सलियों को विश्वास में लेने की वजाए उनको हिंसा के बदले हिंसा के बल पर काबू में लेने की नाकाम कोशिशें की जा रही हैं। जरूरत विकास और अमन के रास्ते से भटके नौजवानों को रास्ते पर लाने की है। उनको सही रास्ता दिखाकर, रोजगार देकर अपने पैरों पर खड़ा करने की है। साथ ही गरीब, आदिवासी इलाकों में अब भी कुंडली मारकर बैठे धनपति, भूपतियों का फन कुचलने की है। नक्सली समस्या समूल खात्मे को जब तक केन्द्र और प्रदेश सरकारें विकास और विस्तार की सोच नहीं अपनाएंगी, हिंसा की ये आग यूं ही देश को जलाती रहेगी।