मार्च 04, 2012

कवियों की अमर कृतियां

कवियों की अमर कृतियां

                                                               

 
हम इतिहास नहीं रच पाए इस में पीड़ा दहते हैं,
अब जो धाराएं पकड़ेंगे इसी मुहाने आएंगे...।
जाकरकह दो शोलों से, चिंगारी से
अबकी फूल खिले हैं पूरी तैयारी से
--
मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है..।

---

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम,
अनगिन झोके उन घटनाओं को दोहराने आएंगे।
रह-रह आंखों में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढ़े तो शायद दृश्य सुहाने आएंगे।
हम इतिहास नहीं रच पाए इस में पीड़ा दहते हैं,
अब जो धाराएं पकड़ेंगे इसी मुहाने आएंगे।

--------------------------------

यहां तक आते-आते सूख जाती हैं नदियां,
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।
--
दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,
और कुछ हो या ना हो, आकाश सी छाती तो है।
--
मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं,
हर गजल सल्तनत के नाम एक बयान है।
--
तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं।
--
रामधारी सिंह दिनकर की लाइन---

जहां पालते हों अनीति-पद्धति
को सत्ताधारी
जहां सूत्रधर हों समाज के
अन्यायी अविचारी
शांति खोलकर खड़ग क्रांति का
जब वर्जन करती है
तभी जान लो, किसी समर का
वह सर्जन करती है।

---
ये अलग बात है खामोश खड़े रहते हैं
फिर भी जो लोग हैं वो बड़े रहते हैं
ऐसे दरबेशों से मिलता है मेरा सजरा
जिनके जूतों में कई ताज पड़े रहते है

राहत इंदौरी--
तूफानों से आंख मिलाओ
सैलाबों पर वार करो
मल्हाहों का चक्कर छोड़ो
तैरकर दरिया पार करो
तुमको मुबारक फर्ज तुम्हारा
हमको मुबारक अपना सुलूक
हम फूलों की साख तलाशें
तुम चाकू पर चार धार करो