जनवरी 29, 2010

प्रभाष जोशी: हद से अनहद


हिंदी पत्रकारिता के पितामह प्रभाष जोशी की याद में 28 जनवरी को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में एक पुस्तक-विमोचन हुआ। ‘हद से अनहद गए’ नामक इस पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने की ।

कुलदीप नैयर ने पुस्तक की पहली प्रति प्रभाष जोशी की पत्नी उषा जोशी जी को भेंट की। प्रभाष जी को याद करते हुए कुलदीप नैयर ने कहा कि प्रभाषजी का ख्वाब था कि कैसे सत्ता लोगों के हाथ में रहे और कैसे लोगों को बदला जाए। वे गांधीजी की तरह बिना हथियार उठाए लोगों के हालात बदलना चाहते थे। उन्होंने बताया कि प्रभाषजी की पढ़ाई हर किस्म की थी, वे सभी पार्टियों की फिलोसफी को जानते थे, वे कभी जेल नहीं गए लेकिन जेल जाने से घबराते नहीं थे। कुलदीप नैयर ने प्रभाषजी की याद में मीर का यह शेर सुनाया- बहुत गौर से सुन रहा था जमाना, हमीं सो गए कहते-कहते।
इस अवसर पर काफी संख्या में लेखक-पत्रकार मौजूद थे। टेलीविज़न के जाने माने चेहरे पुण्य प्रसून वाजपेयी ने प्रभाष जी को पत्रकारिता की मिसाल बताया। प्रभाष जी में खबर को सामान्य जनता की भाषा में लिखने की अद्भुत शैली थी जो आज की पत्रकारिता में खोती जा रही है। पुण्य प्रसून वाजपेयी ने प्रभाषजी से जुड़ी अनेक स्मृतियां साक्षा कीं। उन्होंने कहा कि पेड न्यूज को लेकर प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड और चुनाव आयोग सक्रिय हुए हैं लेकिन उनके बर्ताव में एक उथलापन है। इस मामले में प्रभाषजी का नज़रिया बिल्कुल अलग था। उन्होंने कहा कि प्रभाषजी कठिन से कठिन बात सरलता से समझा देते थे जबकि आज के संपादक और रिपोर्टर गूगल से बाहर नहीं जा पा रहे हैं।

इस अवसर पर प्रभाष जोशी के पुत्र सोपान जोशी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि प्रभाष जी पत्रकार बनने नहीं निकले थे वे तो ग्राम सेवा के लिए शिक्षा को छोड़कर पत्रकारिता से जुड़े । मंगलेश डबराल ने कहा कि प्रभाषजी ऐसे संपादक थे जो मूल रूप से लेखक थे। डबराल ने कहा कि प्रभाष जोशी ने जितना लिखा उतना किसी संपादक ने नहीं लिखा। उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता का औपचारिक ढांचा तोड़ा और इसे अनौपचारिक बना दिया। उनका कहना था कि प्रभाषजी लोकवादी और वे धुनी रमाके और चिमटा बजाके पत्रकारिता करते रहे।

प्रभाष जोशी: हद से अनहद
साहित्यकार अशोक वाजपयी ने कहा कि प्रभाष जी एक मात्र ऐसे पत्रकार थे जिनके विषय में साहित्यकार तथा लेखकों ने भी लिखा। अशोक वाजपेयी ने कहा कि प्रभाषजी उन थोड़े पत्रकारों में से थे जिनकी आवाज साहित्यकारों में सुनी जाती रही है। हिन्दी पत्रकारिता शैली शून्य थी, प्रभाषजी ने अपनी शैली विकसित की। उन्होंने कहा कि मैं ऐसा पत्रकार नहीं जानता जो हिन्दी का प्रवक्ता बन गया हो। प्रभाषजी की कोशिश थी कि हिन्दी लेखकों की सार्वजनिक उपस्थिति और मान्यता बढे़। प्रभाषजी गांधीवादी निर्भयता के अन्तिम प्रवक्ता थे। उन्होंने कहा कि वैचारिक रूप से भले ही हम दोनों में मतभेद रहा हो, लेकिन उनकी नीयत पर कभी सवाल नहीं उठाया जा सकता है।

ओम थानवी ने जनसत्ता के जुडे़ अनुभवों को याद करते हुए बताया कि कैसे प्रभाष जोशी उन्हें जनसत्ता लेकर आए। उन्होंने पंजाब में अलगाववाद के दिनों को याद करते हुए कहा कि प्रभाष जोशी अकेले संपादक थे जिन्होंने आतंकवादियों का आचार संहिता को जनसत्ता में नहीं छापा।


नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सिर्फ हिंदी पत्रकारिता ही नहीं, हिंदी बौद्धिकता का प्रतिनिधित्व भी प्रभाष जी ने किया है। डेढ़ सौ पृष्ठों की पुस्तक का संचयन और संपादन लेखिका रेखा अवस्थी, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह तथा स्मित पराग ने किया है । इस पुस्तक में प्रभाष जोशी पर लिखे गए 37 लेख संकलित किए गए हैं। स्वराज प्रकाशन से छपी इस किताब में कुल 37 लेखकों, पत्रकारों और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों के लेख संकलित हैं।

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