फ़रवरी 03, 2010

बैठे हो तो खड़े हो जाओ

जब से मैंने यह खबर पढ़ी है कि ज्यादा देर तक बैठे रहना सेहत के लिए खतरनाक है और इससे मौत भी हो सकती है, मैं बेहद चिंतित हूँ। खबर में बताया गया है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप रोजाना कसरत करते हैं या नियमित घूमने जाते हैं। अगर आप अपने घर में, ऑफिस में, स्कूल में, कार में या फिर टीवी और कम्प्यूटर के सामने घंटों एक साथ बैठे रहते हैं तो समझ लीजिए कि खतरा आप पर मँडरा रहा है। 'ब्रिटिश जनरल ऑफ स्पोर्ट्स एंड हैल्थ साइंसेज' में छपे एक लेख के अनुसार यदि कोई आदमी चार घंटे एक साथ टिककर बैठा रहे तो उसका शरीर खतरनाक संकेत भेजने लगता है। शरीर में जो जीन ग्लूकोज और फैट (वसा) की मात्रा को जरूरी स्तर पर बनाए रखने का काम करते हैं, वे काम करना बंद कर देते हैं। देर तक बैठकर काम करने वालों को मोटापा ही नहीं, हार्ट अटैक भी हो सकता है और वे मर भी सकते हैं।
NDमैं चिंतित इसलिए हूँ कि मैं सारी जिंदगी बैठा ही रहा हूँ। मोटापा और मधुमेह है। बाईपास सर्जरी हो चुकी है। इस उम्र में मैं कोई दौड़-धूप वाला काम नहीं कर सकता। मैं ऐसा कोई अकेला आदमी नहीं हूँ। लाखों ऐसे लोग हैं जो घंटों किताब पढ़ते रहते हैं, टीवी देखते हैं या कम्प्यूटर पर काम करते हैं। आज के आधुनिक जीवन में आदमी बैठे-बैठे अपनी रोजी-रोटी कमाता है। अगर आप कम्प्यूटर के आगे बैठे किसी आदमी को काम करते देखें तो लगेगा जैसे एक मशीन दूसरी मशीन पर बैठी काम कर रही हो। कम्प्यूटर रखने के लिए ज्यादा जगह की जरूरत नहीं पड़ती। इस बात का फायदा उठाकर अब उस पर काम करने वाले आदमी के लिए बैठने की जगह भी कम कर दी गई है। मुंडी सीधी किए स्क्रीन पर नजर गड़ाए रहो! हाथ-पैर फैलाने की जगह नहीं होती। खुलकर हँसने के लिए भी जितनी जगह चाहिए वह आज के 'वर्क-स्टेशनों' पर कहाँ होती है? बस बैठे रहो गंभीर मुद्रा में मशीन की तरह। टीवी पर कोई मूवी देखनी है तो निगाहें टिका कर रखनी पड़ती हैं। अब कोई टिककर बैठेगा नहीं तो निगाहें क्या खाक टिकाएगा। भारत में महानगरों के छोटे-छोटे घरों में आदमी देर-देर तक बैठा रहता है। जरा-सी जगह में खा, पका, सो और मौज कर। यही जीवन है प्यारे भाई! बैठा रह! दुकानदार जमकर गद्दी पर बैठा रहता है। अफसर दिनभर कुर्सी पर जमा रहता है और बैठे-बैठे घंटी बजाता रहता है। काउंटर पर बैठे कर्मचारियों को लगातार कई-कई घंटे बैठे-बैठे काम करना पड़ता है। लंबी दूरी की ट्रेनों में यात्री को घंटों बैठे रहना पड़ता है। हवाई जहाज का कप्तान और यात्री भी घंटों बैठे रहने के लिए अभिशप्त हैं। समुद्री जहाजों के कप्तान भी बैठकर ही काम करते हैं। भिखारी मंदिरों के बाहर बैठे-बैठे भीख माँगते हैं। हम जैसे निठल्ले छुट्टी के दिन कुर्सी पर बैठे-बैठे ही अपनी पत्नी या बच्चों से काम कराते रहते हैं। मशीनों ने आज आदमी को बैठा दिया है। मशीनें चलती रहती हैं, आदमी बैठा रहता है। जीवन में जो सहज श्रम था, वह खत्म होता जा रहा है। आज तो श्रम करने के लिए भी मशीनों का सहारा लिया जाने लगा है। जिम जाइए। वर्कआउट कीजिए। आधे घंटे की वॉक कर आइए। कैलोरी जलाइए। खाइए और जलाइए। जलिए और जलाइए।आधुनिक जीवन गतिशील है। वहाँ तेज रफ्तार है, तेज संचार है, तेजी से बढ़ने वाला उत्पादन है, तेज से तेज कम्प्यूटर हैं, लेकिन इन सबका इस्तेमाल करने वाला आदमी बैठा हुआ है। आधुनिक जीवन का यह अंतर्विरोध है कि हमारे ज्यादातर काम बैठे-बैठे ही होते हैं। हम इसके लिए विवश हैं। अक्सर हमारी बैठने की मुद्रा ऐसी होती है कि हमें गर्दन के दर्द, कमर के दर्द, रीढ़ की हड्डी में दोष और गठिया जैसे रोगों का सामना करना पड़ता है। यहाँ तक तो काबिले बर्दाश्त है लेकिन ऐसे बैठे रहने से जो अंततः मौत का खतरा बताया जा रहा है, वह चिंतित करने वाला है।भारत में लोग घंटों एक मुद्रा में बैठकर साधना किया करते थे। विचारकों ने बैठे-बैठे नए-नए सत्यों का पता लगाया है, जबकि वैज्ञानिकों को घंटों किताबों में मगज मारना पड़ता है। भारत में संत लोग बैठे-बैठे प्रवचन करते थे और आज जगह-जगह धार्मिक गुरु इसी तरह के प्रवचन कर रहे हैं।

(मधुसूदन- बेव दुनियां से सभार)

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