सुबहे बनारस यानी बनारस की सुबह.
सुबह पाँच बजे बनारस की सड़कों पर लगता है कि सारे रास्ते सिर्फ़ घाट की ओर जाते हैं, चाहे वह दशाश्वमेध घाट हो या फिर अस्सी घाट.
देश-दुनिया से आए लोगों के झुंड घाटों की ओर जाते दिख जाते हैं. रिक्शे पर, ऑटो रिक्शा पर और ज़्यादातर पैदल.
दुकानें सुबह होने से पहले ही सज जाती हैं. फूल की, नारियल-प्रसाद की और चाय की.
भीख माँगने वाले भी घाट की सीढ़ियों पर जम जाते हैं.
मंदिर में घंटियाँ बज रही हैं. दशाश्वमेध घाट पर गंगा के कई मंदिर हैं. एक मंदिर में पुजारी आरती करता दिखाई पड़ा.
नगाड़े और घंटियों की आवाज़ें गूंज रही थी. आश्चर्य हुआ कि पुजारी तो अकेले दिखते हैं तो ये आवाज़ें कहाँ से आ रही हैं. लगा कि रिकॉर्डर बज रहा होगा. लेकिन आवाज़ तो असल जैसी थी. देखा कि बगल के एक छोटे कमरे में एक छोटी मशीन में नगाड़े और घंटी लगे हुए हैं और यह मशीन नगाड़े पीट रही है और घंटी बजा रही है.
लगता है कि गंगा के भक्त कम रह गए.
चैत्र-छठ होने की वजह से महिलाओं की भीड़ कुछ अधिक थी. पूजा पाठ में लगी हुई थीं. सूर्य को भोग चढ़ाने के लिए.
नावों का अंबार दिखता है और हर नाव वाले की मनुहार कि उसी की नाव पर सवार हुआ जाए.
तुलसी घाट पर भी संतन की भीड़ नहीं है. इक्का दुक्का साधु दिखाई देते हैं. लेकिन वे साधु हैं या साधु वेशधारी?
जिनकी श्रद्धा है वो स्नान करते दिखते हैं. हमारा नाव वाला बताता है कि अब गंगा में साबुन लगाकर नहाना मना है जिससे कि गंगा को प्रदूषण से बचाया जा सके.
एक दिन पहले ही गंगा को बचाने के अभियान में जुटे वीरभद्र मिश्रा बता रहे थे कि सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी गंदे नालों का गंगा में गिरना नहीं रोका जा सका है.
हमारी साथी गरिमा नाव में बैठे हुए गंगा को छूकर देखती हैं और संतोष उन्हें हिदायत देते हैं कि बाद में हाथ धो लेना.
घाट पर लगे लाउडस्पीकर पर गाना गूँज रहा है...गंगा तेरा पानी अमृत.
नदी के पार पेड़ों के झुरमुट से सूरज झाँकता है.
एक जोड़ी बूढ़ी आँखें क्षितिज में टकटकी लगाए देख रही हैं, मानो सुबह का इंतज़ार अभी ख़त्म नहीं हुआ।
बीबीसी हिंदी से साभार.....
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