जनवरी 16, 2016

....और मैं पत्रकार बन गया


मैं एटा का हूं। मीठे बोल कहूं तो गोस्वामी तुलसीदास, अमीर खुसरो, बलवीर सिंह ‘रंग’ की जमीन और गंगा-जमुनी तहजीब का एटा। कड़वे
संदर्भ सुनाऊं तो डाकू छविराम के डेरे और अलवर के आतंक का एटा, जो गोली-बोली के स्याह साये से कई दशक बाद भी नहीं उबर पाया है। पैदाइश के बाद मेरा बचपन भी डकैती और अपहरण की कथाएं सुनते-सुनते बीता। 70 के दशक की दस्यु समस्या 80 का दौर आते-आते ‘अपहरण उघोग’ में बदल गई थी। पढ़ाई से पहले परिवार की नसीहत उसी खतरे को लेकर मिली थी। जैसा सुना, वैसा होते भी देखा था।


पिता के दो-दो बार अपहरण से हम भाई-बहनों का गांव छूट गया था।  गांव से शहर और स्कूल से कॉलेज का सफर तय करते-करते कब अखबार की ओर कदम मुड़ गए, मुझे ध्यान भी नहीं है। इतना जरूर याद है कि आज अखबार के हमारे पहले इंचार्ज ने मेरी दिशा पहले ही दिन ‘अपराध’ की तय कर दी थी अौर रिपोर्टिंग की शुरूआत पोस्टमार्टम हाउस से हुई थी। बिन पेजर-मोबाइल की दुनिया में उस वक्त खबरों का खजाना भी शायद वही जगह थी। 

लिफाफे की दौड़ और रेडियो का साथ 



दिनों खबर ही वो होती थी, जो अखबार में आती थी न मोबाइल था और न इंटरनेट। टीवी-रेडियो सुबह-दोपहर और शाम के बुलेटिन बांचते थे। और अखबारों के दफ्तर बाइक, जीप, बस में लिफाफे प्रेस को दौड़ाकर किसी तरह अपना काम चलाते थे। मदद के नाम पर अखबारी दफ्तरों में सिर्फ एक टेलीफोन होता था, जिसे भी फिजूलखर्ची के चक्कर में ताले में कैद रखा जाता था। अमर उजाला-जागरण जब फैक्स की खबरें दौड़ाने लगे थे, तब मेरी शुरूआत ‘लिफाफा शक्ति’ से ही काम चला रहे तीसरे अखबारी मोर्चा यानी आज से हुई थी। हमारे लिए फायदे की बात इतनी थी कि दफ्तर थाने के करीब था और पुलिस का मुखबिर रेडियो हमारी खास ताकत था। 

अदना सा रेडियो थाना पास होने की वजह से पुलिसिया वायरलैस की फ्रीक्वेंसी पकड़कर संदेश लीक कर देता था और सुनते ही हम पैदल, साइकिल या ब्यूरो इंचार्ज की इकलौती बाइक मांगकर घटनास्थल पर दौड़ पड़ते थे। कस्बाई इलाकों से क्षेत्रीय संवाददाता अपनी खबरें तय डेडलाइन में जोड़-तोड़कर लिफाफे के जरिए जिला कार्यालय भेजते थे। उन खबरों को अपना रूप-रंग देकर जिले पर बैठी टीम मोटे लिफाफे में बांधने के साथ उसे डग्गामार जीप में आगरा दौड़ाने काम करती थी। शाम से रात की खबर फिर टेलीफोन के भरोसे ही रह जातीं थी, जिसे आगरा में बैठी डेस्क बुझे मन से ग्रहण करती थी। बाद में हमारे संपादक श्री शशिशेखर जी के प्रयासों से एटा दफ्तर कंप्यूटर-स्कैनर से लैस हुआ तो उस रोज हम सबने मिठाई बांटी थीं। 

ब्रेकिंग मतलब विरोधी चारों खाने चित 


हम पत्रकारों के बीच तब तक ब्रेकिंग शब्द चलन में नहीं आया था। खबरों की अपनी एक रफ़तार थी और बड़ी खबर पिटने की पीड़ा कई-कई दिन महसूस की जाती थी। एटा के प्रमुख चिकित्सक डा. तिलक राज अरोरा के अपहरण में हमने उस तकनीक से बाजी मारी थी। उस रात काम निपटाने के बाद ब्यूरो इंचार्ज परवेज अली के साथ हम और हमारे साथी विमल शर्मा और सुधीर यादव (सुधीर अब इस दुनिया में नहीं) आफिस में बैठे थे। रात साढ़े दस बजे रेडियो पर पुलिस की खबर लीक हुई। पुलिस का मैसेज बस इतना था कि कुछ कार सवार अभी-अभी एक एक व्यक्ति को उठा ले गए हैं। हम भागे-भागे मौके पर पहुंचे।


पता लगा कि  प्रमुख डाक्टर तिलकराज अरोरा का अपहरण हुआ है। डाक्टर का फोटो जुटाने और खबर लिखने में 11 बज गए। अगले दिन तिलकराज अरोरा अपहरण कांड आज अखबार की मय फोटो ब्रेकिंग न्यूज थी। जागरण टीम छपते-छपते सिंगल कॉलम खबर देकर मिसिंग बचा ले गई थी मगर लीडिंग अखबार अमर उजाला खबर में गश खा गया था। तिलकराज की फिरौती देकर रिहाई, आतंकित डाक्टर के शहर छोड़ जाने और सदमे में दूसरे शहर से उनकी मौत की खबर आने को हम अब तक भूल नहीं पाए हैं।  


डाकू छविराम के किस्से और कलुआ का खौफ



टा और उसके पड़ोसी जिले मैनपुरी, बदायूं, फर्रुखाबाद में डाकू छविराम, अलवरा, ऋषिया, नब्बा, पोथी, महावीरा का आतंक मेरी पैदाइश से पहले की कहानी थी मगर डाकू कथाएं हमने बचपन से बड़े-बुजुर्गों की जुबानी सुनी थी। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से पहले एटा-मैनपुरी में नेताजी नाम छविराम डकैत ने हासिल कर लिया था। हमें सुनाया जाता था कि छविराम दरियादिल डकैत था जो लूट-डकैती के माल से गरीब बेटियों की शादी कराता था। जिस रास्ते छविराम होता था, पुलिस अपनी राह दूसरी कर लेती थी। वो इतना ताकतवर डकैत था कि कई बार पुलिस को तारीख और समय बताकर कहीं भी डकैती डाल देता था। पुलिस सुरक्षा चक्र बनाती थी तो खाकी वर्दी पहनकर ही अपना शिकार कर जाता था और काबिल वर्दीवाले हाथ मलते रह जाते थे। 

ये भी सुना था कि छविराम के उलट अलवरा सिरफिरा डकैत था। ऐसा डकैत जो दुआ-सलाम करने वाले को पहचानने के चक्कर में और नहीं सलाम करने वाले पर ना पहचाने की कहकर बंदूक चला देता था। बीपी सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रभावित जिलों में सख्ती से दस्यु उन्मूलन अभियान चला। कई जिलों की पुलिस-पीएसी पीछे लगी तो गिरोह बिखर गए। छविराम, अलवरा, महावीरा जैसे बड़े डकैत मारे गए। कितने ही डकैत सरेंडर कर गए। संगठित दस्यु समस्या उस समय खत्म हो गई। कई जिलों में फैली गंगा की कटरी जरूर उसके बाद भी अपराधी-समूहों की शरणस्थली बनी रही। 



ट्रेन डकैती और जर्मन महिला से रेप 




   साल बाद बदायूं-एटा के बार्डर पर कृष्णा काछी गैंग ने जर्मन महिला से गैंगरेप की वारदात कर सनसनी फैलाई तो सरकार फिर हरकत में आई। हालांकि एक के बाद एक पैदा और खत्म होते रहे अपराधी गिरोहों से पुलिस की लुकाछिपी कलुआ और रामखिलौना डकैत के मारे जाने तक चलती दिखाई दी। बतौर पत्रकार मेरे हिस्से में कल्लू उर्फ कलुआ डकैत की रिपोर्टिंग आई। कई साल आज के साथ बिताने के बाद मैं एटा में ही अमर उजाला से जुड़ गया था। 

उसी दौरान शाहजहांपुर के दुर्दांत डकैत कलुआ ने एटा में पटियाली क्षेत्र के नरथर हॉल्ट पर मरुधर एक्सप्रेस रोककर लूटमार कर डाली थी। मुझे याद है कि आधी रात के बाद सूचना आने पर वो खबर आगरा में तो नहीं छप पाई थी मगर बरेली सिटी संस्करण में उसने छपते-छपते जगह पाई थी। अल सुबह मेरी दौड़ नरथर हॉल्ट की ओर थी। ट्रेन डकैती के दौरान उसमें सवार फौजी की जवाबी फायरिंग में कलुआ का एक साथी ढेर हो गया था। पुलिस बदमाशों की खोज-खबर लेते हुए कटरी में दौड़ी तो गंगा किनारे एक जगह उस बदमाश की चिता चलती पाई थी। पहचान छिपाने को साथी का सिर काटने के बाद कलुआ धड़ जला गया था। वही कलुआ डकैत बाद में एटा, बदायूं, शाहजहांपुर, फर्रुखाबाद जिलों में एक दशक तक पुलिस और पब्लिक के लिए काल बना रहा।

एक तो कम वेतन, उस पर लुटेरा मोबाइल 






  सन् 2000 में मैने एटा छोड़ बरेली दैनिक जागरण में नौकरी पा ली थी। सच कहूं तो छोटे शहर के आदमी ने बड़े शहर में पहली एंट्री पाई थी और बड़े शहर की बड़ी बात मेरी समझ में तभी आई थी। एटा के हो ? कैसे भूल सकता हूं कि साक्षात्कार की रस्म मेरे साथ कुछ ऐसे ही पेश आई थी। और इस एटवी बंदे को फिर ज्यादा भागदौड़ हाथ आई थी। अखबार ने पेट्रोल-मोबाइल मिलाकर मेरी तब तनख्वाह चार हजार लगाई थी। मोबाइल उस समय कॉल आते-जाते दोनों में जेब पर डाका डालता था। शादी में मिला बजाज सुपर स्कूटर ट्रैक्टर की तरह तेल पीता था। बता नहीं सकता कि क्राइम रिपोर्टिंग में स्कूटर और मोबाइल की कीमत मैंने किस तरह अपना और पत्नी का पेट काटकर चुकाई थी। फिर भी मैं कह सकता हूं कि मैने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई थी। तब तक कल्लू कई दर्जन पुलिसकर्मियों की हत्या कर आतंक का पर्याय बन चुका था। तभी इस छोटे रिपोर्टर की कलुआ डकैत पर बड़ी रिपोर्ट सबको पसंद आई थी। 


फिर से मेरे गले पड़ गई क्राइम बीट 



यूं ही 2001 में मैंने  बरेली छोड़ पीलीभीत की दौड़ लगाई। उस समय बरेली में अमर उजाला के समाचार संपादक श्री सुनील शाह जी ( अब इस दुनियां में नहीं) थे। एक सीनियर साथी के जरिए शाहजी से मुलाकात हुई थी और उन्होंने ने मेरी ज्वाइनिंग पीलीभीत ऑफिस में करा दी थी। और अच्छी बात ये थी कि दैनिक जागरण के मुकाबले शाहजी ने उजाला में ठीक दोगुनी तनख्वाह दिलाई थी। इससे पहले तक तो सिर्फ और सिर्फ क्राइम बीट का आदमी था मगर पीलीभीत में मेरे हिस्से पालिका और हेल्थ आई थी। पीलीभीत में उस समय राजीव गुप्ता टीटी पालिका चेयरमैन थे और सफाईकर्मियों ने मांगों को लेकर उग्र आंदोलन छेड़ रखा था। 


 मैने भी वैसे ही भूत बनकर आंदोलन की कवरेज में पूरी जान लगाई। मीत जी पीलीभीत डेस्क के इंचार्ज थे और उन्हें आक्रामक शैली इतनी पसंद आई थी कि जब तक आंदोलन चला, फुलपेज कवरेज के साथ मेरी खबरें पूरे अखबार में छाई रहीं थीं। मैं अपने काम में मन लगाए था मगर मेरा इंतजार तो यहां भी जैसे क्राइम ही कर रखा था। अचानक साथी विवेक सेंगर (अभी शाहजहांपुर में हिन्दुस्तान में ब्यूरो इंचार्ज) ने अचानक ब्यूरो इंचार्ज के व्यवहार से आहत होकर इस्तीफा दे दिया। 



मेरी खबर पर सस्पेंड हुआ पूरा बिलसंडा थाना


विवेक के जाते ही क्राइम बीट की जिम्मेदारी मेरे गले आ पड़ी थी। क्राइम बीट को लेकर मेरा अनुभव कुछ अलग है। वैसे तो ये बीट रसूखदार मानी जाती है मगर रिपोर्टर के लिए उसकी निजी जिंदगी में समय की दुश्वारियां भी साथ  लाती है। हालां‍कि मेरे लिए आसान था, क्योंकि  एटा के 28, बरेली में 29 थानों के मुकाबले पीलीभीत में सिर्फ 13 थाने ही थे। 90 के दशक में आतंकवाद की वजह से पीलीभीत चाहे जितना संवेदनशील जिला रहा हो मगर 2000 तक यहां शांति कायम हो चुकी थी। 


जेल से छूटे पूर्व टांडा बंदियों के कुछ गिरोह जरूर बराही, हरीपुर, माला रेंज के जंगलों में अपहरण और लूट की वारदातें कर रहे थे। इस वजह से उन दिनों क्राइम बीट भी ज्यादा गरमाई थी। मुझे याद है कि उस दिन क्राइम ब्रीट पर मेरा पहला दिन था। मैं स्कूटर से जिला अस्पताल की इमरजेंसी चेक करने गया था। इमरजेंसी में स्ट्रेचर पर  एक युवक बेदम लेटा था और उसके पास खड़े कुछ पुलिसकर्मी डाक्टर पर उसे भर्ती करने को दबाव बना रहे थे। डाक्टर नब्ज देखकर उनसे कह रहा था कि लाश को कैसे अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कर लूं। मेरा माथा ठनक चुका था। थोड़े सवाल-जवाब में ही पता लग गया कि मामला पुलिस हिरासत में मौत का था। दरअसल, बिलसंडा थाने में पकड़कर लाए गए दलित युवक विनोद बहेलिया की मौत हो गई थी और उसे अस्पताल लेकर आए एसओ सच्चाई पर परदा डालने की कोशिश कर रहे थे। 


बीसलपुर तहसील के रिपोर्टर सत्यभान अवस्थी को को मैंने दलित युवक के गांव भेजकर मुख्यालय से बड़ी वारदात के रूप में कवरेज दी। शाम होते-होते सच्चाई और भी भयानक सामने आई थी। दलित बहेलिया को गांव के दबंगों ने एक दिन पहले खूब पीटा था और पेड़ से उल्टा टांगकर उसे पेशाब भी पिलाई थी। फिर थानेवालों से कहकर उल्टा मारपीट के मामले में बंद भी करा दिया था। पहले ही दबंगों की पिटाई से घायल युवक को पुलिस ने थाने में भी खूब पीटा था और उसने हवालात में तड़पते हुए दम तोड़ दिया था। पुलिस हिरासत में युवक की मौत पर मेरा सुबह से शाम तक का होमवर्क पूरा हो चुका था और जागरण टीम को इस बड़ी वारदात की खबर उस दिन रात में लगी थी। नतीजा सामने था। जागरण की सिर्फ दो कॉलम खबर के मुकाबले मेरी कवरेज कई पेज पर पसरी थी और सुबह अमर उजाला पढ़कर एसपी शफी ए हसन रिजवी ने बिलसंडा थाने के एसओ के साथ पूरा स्टाफ को सस्पेंड कर दिया था। 



रात भर नरमुंड छिपाती रही  पीलीभीत पुलिस 

पीलीभीत में अमर उजाला का आॅफिस उस वक्त हांडा पैलेस में था और सुबह का प्लान देने के बाद कोतवाली और थाना सुन्नगढ़ी में झांकते हुए एसपी आफिस की दौड़ लगाना मेरा रुटीन था। एसपी कार्यालय के ठीक पीछे जेल थी और और जेल के पीछे पोस्टमार्टम हाउस।  दोपहर में अचानक किसी ने खबर दी कि जेल के पीछे कुत्तों के झुंड एक मानव कंकाल खसीट रहे हैं। सुनते ही मैं उस ओर दौड़ पड़ा था। कुछ देर में जागरण के क्राइम रिपोर्टर तारिक कुरैशी भी मौके पर थे। तब तक भीड़ जमा हो चुकी थी और जंगली कुत्तों के कब्जे से नौजवान की नग्न लाश भी मुक्त हो चुकी थी। लग रहा था कि शव का पोस्टमार्टम हो चुका था। क्राइम रिपोर्टर का दिमाग अपना काम शुरू कर चुका था। सड़क से नीचे बेशरम बेल की दूर दूर तक पौध खड़ी थी और उसके पीछे नदी बह रही थी। पत्रकार मित्र तारिक के साथ आगे   झाडि़यों में झांककर देखा तो होश उड़ गए। जहां तक नजर जा रही थी, वहां तक नरमुंड ही नरमुंड नजर अा रहे थे। झाडि़यां क्या, आगे नदी किनारे का नजारा भी इतना ही खौफनाक था। पानी का अभाव झेलती नदी में भी खुले-अधखुले बोरों में जहां तहां लाशें तैर रही थीं।

सैकड़ों की तादाद में नरमुंड और नदी में लाशें सनसनीखेज खबर बन चुकी थी। फोटोग्राफर बुलाकर हमने वो मंजर कैद कराया और आफिस आकर फोन से बरेली में समाचार संपादक को पूरी स्थिति बताई। खबर उस दिन के प्रमुख राज्य समाचारों में जगह बना गई। रात में एसपी का बयान लेने के लिए उनको फोन घुमाया था तो सैकड़ों नरमुंड की बात सुनकर वह टेंशन में आ गए थे। एसपी क्या, मेरे पास डीएम, जिला सूचना अधिकारी, पीआरओ पुलिस के फोन भी घनघनाने लगे थे। मेरा फोन पहुंचते ही रात में एसपी और डीएम जेल के पीछे उस जगह पहुंच गए थे, जहां नरमुंड और मानव कंकाल पड़े थे। अफसरों रात भर कई थानों की पुलिस बुलाकर रात भर खुदाई कराई थी मगर पुलिस पूरी तरह से मुंड और कंकाल छिपा नहीं पाई थी। सुबह हमने फ्रंट पेज और अंदर के पन्नों पर कंकाल कथा सबको पढ़वाई तो लखनऊ तक पूरी मशीनरी सकते में आ गई थी। 



कंकाल कथा में खलनायक निकली जीआरपी 

कंकाल और नरमुंड कथा में ये सवाल उठना लाजमी था कि आखिर जेल और पोस्टमार्टम हाउस के पीछे नदी किनारे इतनी बड़ी संख्या में मानव अवशेष आए कहां से ? इस सवाल का जवाब भी जल्दी ही मिल गया था। वो कारतूत खाकी वालों की थी, जो अंतिम संस्कार का सरकारी पैसा हजम करने के लिए वर्षों से लावारिस लाशों को पोस्टमार्ट के बाद जेल के पीछे फेंकते आ रहे थे। उस दिन पीलीभीत शहर के एक व्यापारी के बेटे ने ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली थी। 
रेलवे लाइन पर अज्ञात युवक की लाश बरामद हुई तो थाना जीआरपी पीलीभीत से उसके पोस्टमार्टम की कार्रवाई हुई थी। मरने वाला शहर का था मगर रेलवे पुलिस ने उसकी पहचान कराने की कोई कोशिश नहीं की और लावारिस में ही पंचनामा भरकर शव पोस्टमार्टम को भेज दिया था। ऐसे मामलों में रेलवे की ओर से लावारिस शव के अंतिम संस्कार निर्धारित करम मुहैया कराई जाती है। जीआरपी स्टाफ को भी पैसा मिला था मगर पोस्टमार्टम कराने गए सिपाहियों ने हमेशा की तरह अंतिम संस्कार का पैसा खुद हजम कर लिया और व्यापारी के बेटे की लाश को यूं ही बिना अंतिम संस्कार झाडि़यों में फेंक दिया। उसी शव को जंगल कुत्ते  झाडि़यों से घसीटकर सड़क पर ले आए थे और जीआरपी की करतूत सबके सामने आ गई थी। उस मामले में एसओ जीआरपी रघुनंदन सिंह भदौरिया सहित थाने के कई पुलिसकर्मी सस्पेंड हुए थे।

पत्रकार मित्र सूर्यप्रकाश अवस्थी की हत्या
पीलीभीत में तैनाती के दौरान जागरण के पत्रकार साथी सूर्यप्रकाश अवस्थी की हत्या से मैं अंदर तक हिल गया। सूर्यप्रकाश बरखेड़ा के रहने वाले थे और लंबे समय से जागरण के लिए काम कर रहे थे। अलग-अलग अखबार के मुलाजिम होने से वैसे तो हम दोनों की राह अलग रहती थी मगर निजी जिंदगी में हमारे रिश्ते बहुत अच्छे थे। सूर्यप्रकाश के अवकाश पर होने की स्थिति में उनके रिलीवर तारिक कुरैशी क्राइम बीट देखते थे। तारिक भी हमारे अच्छे मित्रों में थे। उस दिन मैं अपनी खबरें निपटाकर रात दस बजे के करीब रामा कालेज के सामने किराए के कमरे पर आया था। अभी खाना खाने की तैयारी ही कर रहा था कि अचानक मोबाइल पर विधि संवाददाता धीेरेन्द्र मिश्र एडवोकेट का फोन आ गया। घबराई आवाज में उन्‍होंने बस इतना कहा कि अवस्थी का मर्डर हो गया, जल्दी  जिला अस्पताल भेजो। सूर्यप्रकाश अवस्थी उस दिन दोपहर में मुझे रोज एसपी आफिस में मिले थे। उनके मर्डर की सूचना से मैं कांप गया। खाना छोड़ बाहर भागा। किराए के मकान मेें जगह नहीं होने से स्कूटर मैं  300 कदम दूर स्थित सुन्नगढ़ी थाने में खड़ा करता था। घर से थाने पहुंचने को भाग रहा था और बार-बार गिर रहा था। थाने में मेरी हालत देख पुलिसकर्मियों ने कुछ देर रुकने को भी कहा था। उनकी बात अनसुनी कर मैं स्कूटर उठाकर जिला अस्पताल पहुंचा, जहां शहर के कई पत्रकार पहुंच चुके थे। आफिस बंद हो चुका था और मुझे खबर सीधे फोन पर बरेली नोट करानी थी। मैंने हांफते हुए जागरण के क्राइम रिपोर्टर की हत्या की सूचना डेस्क इंचार्ज पवन सक्सेना जी को दी और उनको पूरी खबर नोट कराई। सूर्यप्रकाश रोज की तरह खबरों का काम निपटाकर देर शाम बरखेड़ा में अपने जा रहे थे। कमर में लाइसेंसी रिवाल्वर लगाए सूर्यप्रकाश बाइक खुद चला रहे थे और पीछे उनका एक दोस्त बैठा था। बरखेड़ा से कुछ किमी पहले बदमाशों ने सूर्यप्रकाश पर हमला किया  और उनको मरणासन्न हालत में छोड़  गए। उनकी रिवाल्वर भी लूट ले गए। जब तक सूर्यप्रकाश को अस्पताल लाया गया, उनकी सांसें थम चुकी थीं।  पुलिस कातिलों को जल्दी बेनकाब करे, इसके लिए पत्रकारों ने अगले दिन से पीलीभीत जिले में आंदोलन छेड़ दिया। सभी आपस में मिलकर मारे गए पत्रकार के परिवार की मदद भी की। एसपी की पहल से आर्थिक मदद में पुलिस भी सामनेे आई।  हालांकि लंबी भागदौड़ के बाद भी पूरे जिले की पुलिस पत्रकार अवस्थी के कातिलों काे पकड़ना तो दूर, उनका कोई सुराग ही नहीं जुटा सकी। शक में कई पत्रकारों की खुफिया जांच भी कराई गई मगर पुलिस की यह शंका भी किसी काम नहीं आई। हत्याकांड के पीछे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक कारण तलाशते-तलाशते कब केस की फाइल बंद कर दी गई, किसी को नहीं पता। ....क्रमश: